सिर्फ संदेह के आधार पर पंजीकृत वसीयत रद्द नहीं की जा सकती : हाईकोर्ट, आजमगढ़ निवासी की अपील को खारिज कर 54 वर्ष पूर्व के वसीयत को बरकरार रख की महत्वपूर्ण टिप्पणी

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आजमगढ़। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी पंजीकृत वसीयत को केवल संदेह के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ वसीयतकर्ता के वृद्ध होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके पुत्र ने विश्वास का दुरुपयोग कर उससे वसीयत लिखवा ली। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने 54 वर्ष पुराने वसीयत विवाद में आजमगढ़ निवासी भानु दत्त पाठक की द्वितीय अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
मामला वर्ष 1973 में दादा द्वारा लिखी गई वसीयत से जुड़ा था। वसीयत में वृद्ध ने अपने पोते को संपत्ति से अलग करते हुए छोटे बेटे के पक्ष में संपत्ति कर दी थी। पोते की ओर से वसीयत को रद्द करने की मांग की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने वसीयत को रद्द कर दिया था, लेकिन प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलटते हुए वसीयत को सही माना था। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि वसीयत पंजीकृत थी और उसके गवाह ने पुष्टि की थी कि वसीयतकर्ता ने दस्तावेज को स्वयं पढ़कर उस पर हस्ताक्षर किए थे। अदालत ने कहा कि वसीयत में पोते को संपत्ति से अलग किए जाने का स्पष्ट कारण भी दर्ज था।
अदालत के समक्ष यह तथ्य भी आया कि पोता वर्ष 1949 से सरकारी सेवा में रहने के कारण घर से बाहर रहा और बाद में अपनी पत्नी व बच्चों को भी अपने साथ ले गया। इसके विपरीत छोटे बेटे ने वृद्ध पिता की सेवा की। अदालत ने यह भी माना कि पोते द्वारा समय-समय पर 50 से 200 रुपये के मनीऑर्डर भेजना अपने आप में दादा के प्रति प्रेम और देखभाल का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार की सामान्य व्यवस्था में माता-पिता अपने बच्चों की देखभाल करते हैं। ऐसे में केवल इस आधार पर कि कोई पुत्र माता-पिता के साथ रह रहा था, यह नहीं माना जा सकता कि उसने वृद्ध व्यक्ति पर अनुचित प्रभाव डालकर वसीयत अपने पक्ष में करा ली।
अदालत ने यह भी पाया कि वादी यह साबित नहीं कर सका कि वसीयत तैयार करने के समय वसीयतकर्ता अस्वस्थ मस्तिष्क के थे या अपनी इच्छा से निर्णय लेने की स्थिति में नहीं थे। ऐसे में महज संदेह के आधार पर पंजीकृत वसीयत को अवैध ठहराने का आधार नहीं बनता।
मामले में 19 जुलाई 2022 को अधिकांश पक्षकारों के बीच समझौता हो गया था, जिसका सत्यापन 22 दिसंबर 2022 को किया गया। हालांकि एक प्रतिवादी ने समझौता नहीं किया और अपील का विरोध जारी रखा। हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और वसीयत की वैधानिकता को देखते हुए भानु दत्त पाठक की द्वितीय अपील खारिज कर दी।

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