
आजमगढ़। एस के पी इंटर कॉलेज प्रांगण में आयोजित श्रीरामकथा के पंचम दिवस कथा का शुभारंभ अयोध्या कांड की पावन एवं मांगलिक प्रारंभिक चौपाइयों के सस्वर गायन के साथ हुआ। कथा वाचक आचार्य शांतनु जी महाराज ने जनकपुर से एक माह बाद प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौटने के प्रसंग का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि उस समय अयोध्या की स्थिति पूर्णतः परिवर्तित हो चुकी थी और ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि की बाढ़ सी आ गई थी।
महाराज श्री ने राजा दशरथ द्वारा शीशा देखने के प्रसंग की गूढ़ व्याख्या करते हुए कहा कि शीशा मनुष्य के लिए गुरु भी है और दुश्मन भी। स्वयं देखकर आत्मावलोकन करना गुरु का कार्य है, जबकि दूसरों द्वारा दिखाया गया दर्पण दुश्मन का कार्य कर सकता है। शीशा देखने का तात्पर्य आत्मचिंतन, आत्मसंवाद और आत्मदर्शन से है। जब महाराज दशरथ को अपने श्वेत केश दिखाई पड़े, तब उन्हें राज्य प्रभु श्रीराम को सौंपने का संकेत मिला। महाराज श्री ने कहा कि जीवन के चौथे चरण में मनुष्य को धीरे-धीरे जिम्मेदारियों से हटकर भजन और साधना की ओर प्रवृत्त होना चाहिए।
कथा आगे बढ़ते हुए राज्याभिषेक की तैयारियों और देवताओं द्वारा विघ्न रचना का प्रसंग आया। इस क्रम में सरस्वती जी द्वारा मंथरा की बुद्धि भ्रमित होने और मंथरा द्वारा कैकेयी को कुसंग में डालने की कथा का वर्णन हुआ। आचार्य शांतनु जी महाराज ने कहा कि मंथरा कुसंग का प्रतीक है और दहेज भी उसी प्रकार का विनाशकारी तत्व है। कुसंग का विष अत्यंत भयानक होता है और इसे कभी छोटा नहीं समझना चाहिए।
वरदान प्रसंग का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने बताया कि मां कैकेयी द्वारा प्रभु श्रीराम के वनवास का वरदान मांगना महाराज दशरथ सहन नहीं कर सके। उन्होंने बहुत विनती और उलाहना दी, किंतु कैकेयी नहीं मानी। इससे शिक्षा मिलती है कि कुसंग से हर स्थिति में बचना चाहिए। वनवास की सूचना मिलने पर प्रभु श्रीराम ने मां कौशल्या से आशीर्वाद लेकर प्रस्थान किया। इस प्रसंग में महाराज श्री ने कहा कि इस देश की माताओं के हृदय में वह शक्ति, पराक्रम और सहनशीलता है जो हमारी धर्म-संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखती है। मां कौशल्या पारिवारिक एकता का प्रतीक हैं, जिन्होंने प्रभु श्रीराम को कभी पिता के विरुद्ध नहीं किया, बल्कि आज्ञा पालन की प्रेरणा दी।
लक्ष्मण जी को समझाने के बाद भी जब वे नहीं माने, तो प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण तीनों वन के लिए प्रस्थान कर गए। महाराज श्री ने इसे रघुवंश के भ्रातृ प्रेम का अनुपम उदाहरण बताया, जिसे स्मरण कर आज भी समाज आनंदित होता है।
पंचम दिवस के मुख्य यजमान श्री पंकज अग्रवाल एवं श्रीमती लतिका अग्रवाल रहे।
इस अवसर पर राकेन्दु भूषण शुक्ला, जे.पी. पाण्डेय, अजय अग्रवाल, अरविंद अग्रवाल, गोपाल जायसवाल, बिजेंद्र सिंह, दीनानाथ सिंह, अभिषेक जायसवाल (दीनू), सौरभ सिंह, रश्मि सिंह सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
पूरे पंडाल में भक्ति, वैराग्य और आत्मचिंतन का वातावरण व्याप्त रहा। आचार्य शांतनु जी महाराज की सरस, मार्मिक और जीवनोपयोगी व्याख्या ने श्रोताओं को गहरे तक प्रभावित किया और पंचम दिवस की कथा आध्यात्मिक ऊंचाई पर संपन्न हुई।
