
आजमगढ़, 28 अगस्त। अंतरराष्ट्रीय भोजपुरी संगम भारत एवं गौरवशाली पूर्वांचल के कोलघाट स्थित प्रधान कार्यालय में शुक्रवार को ‘शकुंतला का प्रकृति प्रेम, सावन की कजरी एवं नारी महत्व’ विषय पर साहित्यिक संगोष्ठी एवं काव्य पाठ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में संस्कृत के महाकवि कालिदास की अमर कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ पर आधारित भोजपुरी खंडकाव्य ‘शकुंतला’ के माध्यम से नारी, प्रकृति और लोक संस्कृति के संबंधों पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता भोजपुरी के प्रसिद्ध कवि बालेदिन यादव ने की। मुख्य अतिथि प्रसिद्ध साहित्यकार एवं गजलकार दिनेश श्रीवास्तव रहे, जबकि संचालन भोजपुरी अकादमी एवं लोक कला शोध संस्थान के मुख्य प्रभारी अरविंद चित्रांश ने किया। मुख्य वक्ता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी रहे।
मुख्य वक्ता डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने कहा कि उन्होंने महाकवि कालिदास की कालजयी रचना की शकुंतला को भोजपुरी की माटी और लोक संवेदना से जोड़ने का प्रयास किया है। उनके अनुसार शकुंतला यह संदेश देती है कि नारी और प्रकृति एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। नारी सृजन की शक्ति होने के साथ प्रकृति की सच्ची रक्षक भी है।
अरविंद चित्रांश ने कहा कि शकुंतला कण्व ऋषि की पालिता पुत्री थीं, लेकिन उनका संबंध मेनका और विश्वामित्र से था। आश्रम में शकुंतला हिरण के बच्चे को अपने पुत्र की तरह मानती थीं और पेड़-पौधों को पानी पिलाने के बाद ही स्वयं पानी पीती थीं। उन्होंने कहा कि शकुंतला के आश्रम से विदा होने का प्रसंग मनुष्य और प्रकृति के आत्मीय संबंध को दर्शाता है। उनके जाने पर लताओं का पत्ते गिराना और मोरों का नाचना बंद कर देना प्रकृति के साथ उनके गहरे लगाव का प्रतीक है।
अध्यक्ष बालेदिन यादव ने कहा कि संस्कृत की इस कालजयी रचना को अनेक साहित्यकारों ने हिंदी में प्रस्तुत किया, लेकिन डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने इसे भोजपुरी भाषा में उतारकर भोजपुरी साहित्य को नई ऊंचाई दी है। प्रसिद्ध गीतकार राकेश पांडेय ‘सागर’ ने कहा कि इस कृति ने साबित किया है कि भोजपुरी में भी करुणा, श्रृंगार और दर्शन को उतनी ही प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त किया जा सकता है। भोजपुरी केवल बिरहा और कजरी की भाषा नहीं, बल्कि महाकाव्यात्मक अभिव्यक्ति की भी समर्थ भाषा है।
कवि शैलेंद्र मोहन राय ‘अटपट’ ने अपने काव्य पाठ के माध्यम से शकुंतला के दर्द और विरह को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भोजपुरी में रची शकुंतला अब महल की नायिका नहीं, बल्कि लोकजीवन और प्रकृति से जुड़ी संसार की बेटी नजर आती है।
अरविंद चित्रांश ने सावन की कजरी को भी नारी और प्रकृति के संबंध का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि सावन में महिलाएं झूला झूलते हुए कजरी गाती हैं। इन गीतों में खेत-खलिहान, नदी, बादल, पेड़-पौधे और प्रकृति के प्रति गहरा लगाव दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि शकुंतला के प्रकृति प्रेम और लोकजीवन की कजरी में एक समान संवेदना दिखाई देती है।
डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने काव्य पाठ करते हुए कहा कि शकुंतला ने हमें सिखाया कि नारी और प्रकृति अलग नहीं हैं। नारी सृजन की शक्ति है और प्रकृति की रक्षक भी। उन्होंने कहा कि शकुंतला का प्राकृतिक प्रेम कजरी की आत्मा में दिखाई देता है। विरह में भी नारी की शक्ति मौजूद है और सावन की कजरी में परदेस गए पति की प्रतीक्षा केवल पीड़ा नहीं, बल्कि जीवन को संभालने की ताकत भी है।
कार्यक्रम में दिनेश श्रीवास्तव, बिन्नी श्रीवास्तव, मधुकर श्रीवास्तव, श्रेया दुबे, सुमन दुबे, कंचन लता भारती, राकेश पांडेय ‘सागर’, डॉ. अवनीश अस्थाना, डॉ. सुभाष सिंह, शैलेंद्र मोहन राय ‘अटपट’, अतुल श्रीवास्तव, सारिका श्रीवास्तव, जानवी, अनामिका यादव, श्रेष्ठ सिंह, बिट्टू यादव, माही, अंशिका चित्रांश, कैलाशपति देवी, प्रांजल पांडेय समेत साहित्य एवं कला जगत से जुड़े लोग मौजूद रहे।
अंत में अरविंद चित्रांश ने कहा कि महाकवि कालिदास की शकुंतला ने नारी और प्रकृति के अटूट संबंध का संदेश दिया। डॉ. ईश्वर चंद्र त्रिपाठी ने उसी शकुंतला को भोजपुरी में प्रस्तुत कर यह याद दिलाया है कि सावन में कजरी गाने वाली मातृशक्ति अपनी धरती, पेड़-पौधों और पुरखों की स्मृतियों से जुड़ी हुई है। यही नारी शक्ति और लोक संस्कृति की वास्तविक पहचान है।
