बसपा छोड़ सुभासपा में शामिल हुए प्रदीप सिंह कबूतरा, अजीत सिंह हत्याकांड से जुड़ा रहा नाम, राजनीतिक गलियारों में तेज हुई चर्चाएं

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लखनऊ की सियासत में मंगलवार को उस समय बड़ा राजनीतिक हलचल देखने को मिला, जब चर्चित अजीत सिंह हत्याकांड में नामजद रहे प्रदीप सिंह कबूतरा ने बहुजन समाज पार्टी का साथ छोड़कर ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) का दामन थाम लिया। प्रदीप सिंह कबूतरा के सुभासपा में शामिल होते ही प्रदेश की राजनीति गरमा गई है और विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
राजधानी लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम के दौरान सुभासपा नेताओं की मौजूदगी में प्रदीप सिंह कबूतरा को पार्टी की सदस्यता दिलाई गई। इसके बाद से ही राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। कई राजनीतिक जानकार इसे आगामी 2027 विधानसभा चुनाव की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे अपराध और राजनीति के गठजोड़ का उदाहरण बता रहा है।
गौरतलब है कि वर्ष 2021 में राजधानी लखनऊ में हुए चर्चित अजीत सिंह हत्याकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। इस हाईप्रोफाइल हत्याकांड में कई बड़े नाम सामने आए थे। जांच के दौरान प्रदीप सिंह कबूतरा का नाम उन लोगों में शामिल हुआ था, जिन पर शूटरों को मदद और शरण देने का आरोप लगा था। पुलिस जांच में उसका कनेक्शन लॉरेंस बिश्नोई गैंग के शार्प शूटरों और गैंगस्टर ध्रुव सिंह कुटू से भी जुड़ा बताया गया था।
बताया जाता है कि पुलिस की लगातार दबिश और बढ़ते दबाव के बाद प्रदीप सिंह कबूतरा ने आजमगढ़ में सरेंडर किया था। इसके बाद वह लंबे समय तक जेल में रहा। जेल से बाहर आने के बाद उसने सक्रिय राजनीति में वापसी की कोशिश शुरू की और अब सुभासपा में शामिल होकर उसने नई राजनीतिक पारी की शुरुआत कर दी है।
प्रदीप सिंह कबूतरा के सुभासपा में शामिल होने के बाद विपक्षी दलों ने NDA सहयोगी दल और सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि गंभीर आपराधिक मामलों से जुड़े लोगों को राजनीतिक संरक्षण दिया जा रहा है। वहीं सुभासपा की ओर से अभी इस मामले पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
फिलहाल प्रदीप सिंह कबूतरा की सुभासपा में एंट्री को लेकर प्रदेश की राजनीति में चर्चाओं का बाजार गर्म है। अब देखना यह होगा कि यह फैसला 2027 के चुनावी समीकरणों में कितना असर डालता है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी कितना तूल पकड़ती है।

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