रूस की जंग ने निगल लिए आजमगढ़ के सपने: न शव मिला, न आखिरी दीदार… बस वर्दी और झंडा ही लौटे घर

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रोटी की तलाश में घर से निकले बेटे की आज भी राह देख रहा अपाहिज पिता, पत्नी की आंखें हर दस्तक पर ठहर जाती हैं
“जो घर से निकले थे रोटी की तलाश में,
लौटे तो बस कुछ यादों का सामान बनकर।
न कंधा मिला अपनों का, न आखिरी दीदार,
अधूरी रह गई हर मां-बाप की पुकार।”

आजमगढ़। गरीबी से लड़ने और परिवार की जिंदगी संवारने का सपना लेकर दो साल पहले विदेश गए आजमगढ़, मऊ और आसपास के जिलों के एक दर्जन से अधिक युवकों की कहानी अब दर्द और इंतजार की दास्तान बन चुकी है। बेहतर नौकरी और अच्छी कमाई का सपना दिखाकर एजेंटों ने इन युवकों को रूस भेज दिया, लेकिन वहां पहुंचने के बाद वे यूक्रेन-रूस युद्ध की आग में झोंक दिए गए। शुरुआत में कुछ महीनों तक परिवारों से बातचीत होती रही, लेकिन फिर एक-एक कर सभी संपर्क टूट गए। इसके बाद से परिजन दर-दर की ठोकरें खाते रहे, सरकार से गुहार लगाते रहे, लेकिन किसी बेटे की सकुशल वापसी नहीं हो सकी।
हाल ही में पंजाब निवासी जगदीश नामक व्यक्ति कुछ परिवारों के घर पहुंचे। उनके हाथों में न तो बेटों की खुशखबरी थी और न ही उनके शव। उन्होंने केवल रूस की वर्दी, टोपी, झंडा और कुछ निजी सामान परिवारों को यह कहते हुए सौंप दिया कि यही उनके अपनों की आखिरी निशानी है। इन सामानों को देखते ही परिवारों का दर्द छलक पड़ा। किसी मां ने बेटे की वर्दी सीने से लगा ली तो कोई पिता झंडे को देखते हुए फूट-फूटकर रो पड़ा।
इन्हीं पीड़ित परिवारों में मुबारकपुर थाना क्षेत्र के तड़ियावां गांव निवासी मूलचंद का परिवार भी शामिल है। मूलचंद शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और बेहद गरीब परिवार से हैं। उन्होंने बड़ी मुश्किल से करीब डेढ़ लाख रुपये जुटाकर अपने 45 वर्षीय बेटे धीरेंद्र कुमार को विदेश कमाने भेजा था। धीरेंद्र पहले पंजाब गया, जहां कुछ लोगों ने रूस में अच्छी नौकरी और मोटी तनख्वाह का लालच दिया। इसके बाद वह रूस पहुंच गया। परिवार का आरोप है कि आजमगढ़ और मऊ के कुछ लोग ही एजेंट बनकर युवकों को वहां भेजने का काम कर रहे थे।
धीरेंद्र की पत्नी शशिकला बताती हैं कि रूस जाने के बाद शुरुआती दो महीनों तक पति ने 50-50 हजार रुपये घर भेजे। परिवार को लगा कि अब उनकी गरीबी दूर हो जाएगी, लेकिन अचानक फोन आना बंद हो गया। इसके बाद न कोई संदेश मिला और न ही कोई जानकारी। परिवार हर दिन उम्मीद करता रहा कि शायद आज कोई कॉल आएगी, लेकिन इंतजार लंबा होता गया।
एक दिन पहले पंजाब से आए लोगों ने धीरेंद्र की वर्दी, टोपी और रूस का झंडा परिवार को सौंप दिया। साथ ही बताया कि धीरेंद्र का शव भी नहीं मिल पाया। यह सुनकर पूरे परिवार पर मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। इसके बावजूद अपाहिज पिता मूलचंद आज भी उम्मीद नहीं छोड़ पाए हैं। उनका कहना है कि जब तक बेटे का शव नहीं मिला, तब तक उन्हें विश्वास है कि धीरेंद्र कहीं न कहीं जीवित होगा।
मूलचंद कहते हैं कि उन्होंने बेटे को इसलिए विदेश भेजा था ताकि परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर सके। आज वही परिवार फिर से बदहाली में जीने को मजबूर है। धीरेंद्र के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे और दो बेटियां हैं। बड़ा बेटा करीब 20 वर्ष का है। घर की जिम्मेदारियां अब उसी के कंधों पर आ गई हैं।
पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्होंने कई बार सरकार और प्रशासन से अपने बेटों की तलाश कराने और उन्हें स्वदेश वापस लाने की गुहार लगाई, लेकिन अब तक कोई ठोस राहत नहीं मिली। उनका कहना है कि यदि शव भी मिल जाए तो कम से कम अंतिम संस्कार कर मन को तसल्ली मिल सके।
आज भी तड़ियावां गांव में मूलचंद का परिवार दरवाजे पर नजरें टिकाए बैठा है। हर आहट पर उन्हें लगता है कि शायद धीरेंद्र लौट आया हो। मगर हर बार उम्मीद टूट जाती है। उनके आंसू सिर्फ अपने बेटे के लिए नहीं, बल्कि उन सभी युवकों के लिए हैं जो बेहतर भविष्य की तलाश में घर से निकले और युद्ध की विभीषिका में कहीं गुम हो गए।

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