सतगुरु नानक प्रगटिया, मिटी धुँध जग चानन होआ, धूमधाम से मनाया गया, श्री गुरु नानक देव जी का 556वाँ प्रकाशोत्सव, जीवन पर डाला प्रकाश

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आजमगढ़: बुधवार को श्री गुरु नानक देव जी का 556 वॉ प्रकाशोत्सव के अवसर पर श्री सुंदर गुरुद्वारा मातबरगंज में मनाया गया। 02-11-2025 से 04-11-2025 को प्रातः 5:30 बजे प्रभातफेरी श्री सुंदर गुरुद्वारे से शहर के मुख्य मार्गों से निकाली गई थी। जिसमें श्रद्धालु संगतों ने शब्द कीर्तन करते हुए शहर का भ्रमण करते हुए वापस गुरुद्वारे पहुँची। दिनांक 05-11-2025 को प्रातः 10.00 बजे सहज पाठ साहिब जी की समाप्ति हुई जिसके उपरांत शब्द कीर्तन अरदास की गई जिसके बाद कड़ाह प्रसाद वितरण किया गया एवं गुरु का लंगर अटूट बरताया गया।
समस्त कार्यक्रम में सभी धर्म के लोगों ने मिलकर गुरु घर की ख़ुशियाँ प्राप्त की। गुरु नानक देवजी सिखों के पहले गुरु थे। अंधविश्वास और आडंबरों के कट्टर विरोधी गुरु नानक देव जी का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। पंजाब के तलवंडी नामक स्थान में एक किसान के घर जन्मे नानक के मस्तक पर शुरू से ही तेज आभा थी। तलवंडी जोकि पाकिस्तान के लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित है, गुरु नानक का नाम साथ जुड़ने के बाद आगे चलकर ननकाना कहलाया। गुरुनानक बचपन से ही गंभीर प्रवृत्ति के थे। बाल्यकाल में जब उनके अन्य साथी खेल कूद में व्यस्त होते थे तो वह अपने नेत्र बंद कर चिंतन मनन में खो जाते थे। यह देख उनके पिता कालू एवं माता तृप्ता चिंतित रहते थे। उनके पिता ने पंडित हरदयाल के पास उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा लेकिन पंडितजी बालक नानक के प्रश्नों पर निरुत्तर हो जाते थे और उनके ज्ञान को देखकर समझ गए कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर संसार में भेजा है। नानक को मौलवी कुतुबुद्दीन के पास पढ़ने के लिए भेजा गया लेकिन वह भी नानक के प्रश्नों से निरुत्तर हो गए। नानक ने घर बार छोड़ बहुत दूर दूर के देशों में भ्रमण किया जिससे उपासना का सामान्य स्वरूप स्थिर करने में उन्हें बड़ी सहायता मिली। अंत में कबीरदास की ‘निर्गुण उपासना’ का प्रचार उन्होंने पंजाब में आरंभ किया और वे सिख संप्रदाय के आदिगुरु हुए। सन् 1485 में नानक का विवाह बटाला निवासी कन्या सुलक्खनी से हुआ। उनके दो पुत्र श्रीचन्द और लक्ष्मीचन्द थे। गुरु नानक के पिता ने उन्हें कृषि, व्यापार आदि में लगाना चाहा किन्तु यह सारे प्रयास नाकाम साबित हुए। उनके पिता ने उन्हें घोड़ों का व्यापार करने के लिए जो राशि दी, नानक ने उसे साधु सेवा में लगा दिया। कुछ समय बाद नानक अपने बहनोई के पास सुल्तानपुर चले गये। वहां वे सुल्तानपुर के गवर्नर दौलत खां के यहां मादी रख लिये गये। नानक अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ करते थे और जो भी आय होती थी उसका ज्यादातर हिस्सा साधुओं और गरीबों को दे देते थे।

गुरु नानक देवजी ने जात−पांत को समाप्त करने और सभी को समान दृष्टि से देखने की दिशा में कदम उठाते हुए ‘लंगर’ की प्रथा शुरू की थी। लंगर में सब छोटे−बड़े, अमीर−गरीब एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। आज भी गुरुद्वारों में उसी लंगर की व्यवस्था चल रही है, जहां हर समय हर किसी को भोजन उपलब्ध होता है। इस में सेवा और भक्ति का भाव मुख्य होता है।

गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति−पूजा आदि निरर्थक है। नाम−स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत−प्रोत है।

गुरु नानक देव जी ने ही एक ओंकार का नारा दिया था और कहा था सबका ईश्वर एक है इसलिए सभी से प्रेम करना चाहिए तथा लोगों को प्रेम, एकता, समानता और भाईचारा का संदेश दिया गुरु नानक देव जी ने पुरुष और स्त्री को हमेशा बराबर मानते थे उनके अनुसार कभी भी महिलाओं का अनादर नहीं करना चाहिए

गुरु नानक देव जी ने मानवता को ‘नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ का महामंत्र दिया, जिसका अर्थ है: ईश्वर का नाम जपो, ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करो, और जो कुछ भी कमाई करो, उसे लोगों के साथ मिल-बांटकर छको

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