






आजमगढ़:जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) कार्यालय में बुधवार को उस समय हड़कंप मच गया जब एक युवक ने खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह करने की कोशिश की। कार्यालय परिसर में मौजूद कर्मचारियों और अन्य लोगों ने तत्काल सूझबूझ दिखाते हुए युवक को समझा-बुझाकर शांत कराया, जिससे एक बड़ा हादसा टल गया। घटना के बाद कार्यालय में कुछ देर तक अफरातफरी का माहौल बना रहा।
युवक की पहचान सौरभ तिवारी के रूप में हुई है, जो अपने पिता के वेतन भुगतान को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से आक्रोशित था। सौरभ ने आरोप लगाया कि उसके पिता अशोक तिवारी, जो अंजुमन इस्लामिया उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, दौना लालगंज में शिक्षक हैं, के वेतन भुगतान के बदले अधिकारियों द्वारा अवैध धन की मांग की जा रही है।
पुराना है विवाद, कोर्ट तक पहुंचा मामला
जानकारी के अनुसार, संबंधित विद्यालय वर्ष 2002 में अनुदान सूची में शामिल हुआ था। इसके बाद नियुक्तियों को लेकर विवाद खड़ा हो गया, जो न्यायालय तक पहुंचा। इस विवाद के चलते शिक्षकों का वेतन लंबे समय तक बाधित रहा। वर्ष 2016 में न्यायालय ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन इसके बावजूद भुगतान की प्रक्रिया पूरी तरह सुचारु नहीं हो सकी।
परिजनों का आरोप है कि वर्ष 2024 में भी न्यायालय ने शिक्षकों के पक्ष में निर्णय देते हुए वेतन भुगतान के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद तत्कालीन डीआईओएस उपेंद्र कुमार के कार्यकाल में वेतन जारी करने के लिए लगभग 25 लाख रुपये की मांग की गई। आरोप है कि आंशिक भुगतान के बाद भी वेतन फिर रोक दिया गया।
अधिकारियों के बदलने से भी नहीं सुलझा मामला
बताया गया कि उपेंद्र कुमार के अवकाश पर जाने के दौरान कार्यभार संभालने वाले अधिकारी वीरेंद्र प्रताप सिंह ने कुछ समय के लिए वेतन भुगतान शुरू कराया। लेकिन उपेंद्र कुमार के पुनः कार्यभार संभालने के बाद फिर से भुगतान रोक दिया गया।
सौरभ तिवारी के अनुसार, 31 जनवरी 2026 को संयुक्त शिक्षा निदेशक (जेडी) कार्यालय में हुए हंगामे के बाद उनके पिता का वेतन दोबारा जारी किया गया। हालांकि इसके बाद उपेंद्र कुमार का स्थानांतरण हो गया। वर्तमान में प्रभारी डीआईओएस मनोज कुमार के कार्यकाल में मार्च माह का वेतन फिर रोक दिया गया, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान हो गया और आत्मदाह जैसा कदम उठाने को मजबूर हुआ।
डीआईओएस ने आरोपों को बताया निराधार
वहीं प्रभारी डीआईओएस मनोज कुमार ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि वेतन रोकने का निर्णय न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में लिया गया है और इसमें किसी प्रकार की अवैध वसूली या भ्रष्टाचार का कोई सवाल नहीं है।
प्रशासन की भूमिका पर उठे सवाल
घटना के बाद एक बार फिर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और लंबित मामलों के निस्तारण को लेकर सवाल उठने लगे हैं। यदि समय रहते समस्या का समाधान किया गया होता, तो इस तरह की गंभीर स्थिति उत्पन्न नहीं होती। फिलहाल मामले की जांच और आगे की कार्रवाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है, लेकिन इस घटना ने विभागीय व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
